मध्य-पूर्व का धधकता क्षितिज: क्या विश्व तीसरे वैश्विक संघर्ष की ओर बढ़ रहा है?

Saiadmin

एन0के0शर्मा
रेगिस्तान की रेत जब बारूद की गंध से भरने लगती है, तो दुनिया के शेयर बाज़ारों से लेकर कूटनीतिक गलियारों तक बेचैनी फैल जाती है। आज मध्य-पूर्व केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की प्रयोगशाला बन चुका है—जहाँ हर विस्फोट, हर ड्रोन, हर बयान के पीछे महाशक्तियों की अदृश्य उंगलियाँ दिखाई देती हैं। प्रश्न केवल इतना नहीं है कि क्षेत्र में युद्ध होगा या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या यह टकराव धीरे-धीरे एक व्यापक, बहुध्रुवीय वैश्विक संघर्ष की भूमिका लिख रहा है?
इज़राइल और ईरान के बीच छाया युद्ध अब परोक्ष संकेतों से निकलकर प्रत्यक्ष हमलों, साइबर हमलों और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्षों के स्तर तक पहुँच चुका है। गाज़ा की त्रासदी ने मानवाधिकार विमर्श को झकझोरा है, पर उससे अधिक उसने भू-राजनीतिक समीकरणों को भंग किया है। लेबनान की सीमाओं पर सक्रिय समूह, सीरिया के भीतर सक्रिय सैन्य ठिकाने, यमन से उठते मिसाइल—ये सब केवल स्थानीय असंतोष की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं; ये एक ऐसे नेटवर्क का हिस्सा हैं जिसमें वैचारिक, धार्मिक और सामरिक लक्ष्य एक-दूसरे में उलझे हुए हैं।
इस पूरे परिदृश्य में संयुक्त राज्यों की भूमिका निर्णायक और विवादास्पद दोनों है। वह अपने पारंपरिक सहयोगियों की सुरक्षा का दावा करता है, पर उसकी सैन्य उपस्थिति और हथियार आपूर्ति क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को और तीखा कर देती है। दूसरी ओर रूस और चीन इस अस्थिरता को केवल संकट नहीं, अवसर के रूप में भी देखते हैं—ऊर्जा मार्गों, हथियार सौदों और कूटनीतिक प्रभाव के विस्तार के अवसर के रूप में। यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक शक्ति-संतुलन पहले ही विचलित है; ऐसे में मध्य-पूर्व का विस्फोट किसी भी क्षण बहुध्रुवीय सैन्य संलिप्तता में बदल सकता है।
तेल इस पूरे समीकरण का मौन लेकिन सबसे प्रभावशाली पात्र है। फारस की खाड़ी के जलमार्गों पर तनाव का अर्थ है वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल, मुद्रास्फीति, आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक असंतोष। यूरोप पहले से ऊर्जा संकट के दंश झेल चुका है; एशिया की अर्थव्यवस्थाएँ आयात पर निर्भर हैं। यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य बाधित होता है, तो यह केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा—यह विश्व अर्थव्यवस्था की धमनियों पर सीधा प्रहार होगा।
लेकिन केवल भू-राजनीति ही नहीं, वैचारिक उन्माद भी इस आग को हवा दे रहा है। धार्मिक प्रतीकों, ऐतिहासिक आक्रोश और पहचान की राजनीति ने संघर्ष को नैतिक वैधता का आवरण दे दिया है। सोशल मीडिया पर फैलते वीडियो, अधूरी सूचनाएँ और उग्र नैरेटिव जनमत को ध्रुवीकृत कर रहे हैं। यह युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जा रहा; यह मनोवैज्ञानिक और सूचना-युद्ध का भी नया अध्याय है।
संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच बार-बार शांति की अपील करते हैं, पर वीटो-राजनीति उन्हें निष्प्रभावी बना देती है। जब सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य ही प्रत्यक्ष या परोक्ष पक्षकार बन जाएँ, तो वैश्विक शासन व्यवस्था की नैतिक शक्ति क्षीण हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार बदलती दिखाई देती है—कहीं आत्मरक्षा का अधिकार, कहीं मानवीय हस्तक्षेप, तो कहीं संप्रभुता का तर्क।
तीसरे वैश्विक संघर्ष की संभावना पर विचार करते समय यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। साइबर हमले, उपग्रह संचार में व्यवधान, वित्तीय प्रतिबंध, समुद्री नाकेबंदी—ये सभी युद्ध के नए आयाम हैं। यदि किसी एक घटना—जैसे किसी उच्च-स्तरीय सैन्य कमांडर की हत्या, या किसी बड़े शहर पर मिसाइल हमला—से प्रत्यक्ष महाशक्ति टकराव शुरू होता है, तो यह संघर्ष सीमित नहीं रहेगा। नाटो की प्रतिबद्धताएँ, क्षेत्रीय सुरक्षा समझौते और रक्षा गठबंधन श्रंखलाबद्ध प्रभाव की तरह सक्रिय हो सकते हैं।
भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात और खाड़ी देशों में प्रवासी समुदाय पर निर्भर हैं, इस संकट से अछूते नहीं रह सकते। तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री व्यापार मार्गों में अवरोध और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दबाव डाल सकती है। साथ ही, भारत की संतुलित कूटनीति—जो एक ओर पश्चिमी देशों से रणनीतिक साझेदारी रखती है और दूसरी ओर पश्चिम एशिया तथा रूस के साथ संवाद बनाए रखती है—कठिन परीक्षा से गुजर सकती है।
क्या यह सब तीसरे विश्वयुद्ध की प्रस्तावना है? इतिहास सिखाता है कि विश्वयुद्ध अचानक नहीं होते; वे असंख्य क्षेत्रीय टकरावों, गलत आकलनों और अहंकार की श्रृंखलाओं से जन्म लेते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध भी एक क्षेत्रीय हत्या से शुरू हुआ था, पर गठबंधनों की जटिलता ने उसे वैश्विक बना दिया। आज की दुनिया उससे कहीं अधिक परस्पर जुड़ी हुई है—आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से और सैन्य रूप से।
मध्य-पूर्व का धधकता क्षितिज हमें चेतावनी दे रहा है कि वैश्विक व्यवस्था की नींव दरक रही है। यदि संवाद की खिड़कियाँ बंद होती रहीं और प्रतिशोध की भाषा प्रमुख बनी रही, तो आने वाला समय केवल क्षेत्रीय मानचित्र नहीं बदलेगा; वह विश्व-व्यवस्था का स्वरूप भी बदल सकता है। सवाल यह नहीं कि युद्ध संभव है या नहीं—सवाल यह है कि क्या मानवता, इतिहास की चेतावनियों के बावजूद, एक और महाविनाश की ओर कदम बढ़ा रही है।
और यदि यह आग भड़की, तो उसकी लपटें किसी एक सीमा पर नहीं रुकेंगी।

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