वी पी एस खुराना
मथुरा जनपद में एक ओर कलेक्ट्रेट के बंद कमरों में पर्यावरण बचाने के लिए बैठकों का सिलसिला तेज है, दूसरी ओर यमुना की घुटती धारा, बदहाल पड़े ब्रज के कुंड, शहर-गांव में लगे कूड़े के पहाड़ और ताज़ा मामला अक्रूर के जंगलों में हरे पेड़ों की कटाई—जमीनी सच्चाई का आईना दिखा रहे हैं। सवाल यह है कि योजनाओं और निर्देशों की फाइलों से बाहर निकलकर परिणाम धरातल पर कब दिखाई देंगे।
जिला गंगा समिति, जिला पर्यावरण समिति और जिला वृक्षारोपण समिति की बैठक में अपशिष्ट प्रबंधन, कुंडों के जीर्णोद्धार, डिसिल्टिंग, वृक्षारोपण और प्रदूषण नियंत्रण के निर्देश दिए गए। राधाकुंड और मल्हार कुंड को आदर्श वॉटर बॉडी बनाने की बात कही गई, नावों पर डस्टबिन रखने और ईंट-भट्टों पर एनओसी की प्रक्रिया का आश्वासन भी मिला। लेकिन यमुना में गिरते नाले, गंदगी से पटे कुंड, खुले में पड़ा प्लास्टिक व मलबा और पेड़ों की कटाई यह बताने के लिए काफी हैं कि बैठकों और जमीनी अमल के बीच दूरी अभी भी बनी हुई है।
पर्यावरण को बचाना निश्चित रूप से समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है, लेकिन जिन विभागों और समितियों को इसके लिए संसाधन, बजट और अधिकार मिले हैं, उनकी जवाबदेही सबसे अहम है। सरकारी खजाने से चलने वाली व्यवस्थाएं यदि केवल बैठक दर बैठक तक सीमित रह जाएं तो जनता के बीच सवाल उठना स्वाभाविक है।
जरूरत इस बात की है कि बैठकों का दायरा बंद कमरों से निकलकर ओपन हाउस तक पहुंचे, जहां यमुना किनारे रहने वाला व्यक्ति, कुंडों की बदहाली देख रहा श्रद्धालु, कूड़े से जूझ रही कॉलोनियों के लोग और कटते पेड़ों के गवाह अपनी बात सीधे रख सकें। वास्तविकता फाइलों से नहीं, मैदान से सामने आती है।
यदि पर्यावरण को सचमुच समस्या मानकर उसके समाधान के लिए विभाग बने हैं तो तय समयसीमा में काम, पारदर्शी मॉनिटरिंग और जिम्मेदारी तय करना अनिवार्य होगा। और यदि बैठकों का सिलसिला ही उपलब्धि बनता रहा तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इसका बोझ अंततः जनता ही उठाती है।
मथुरा की यमुना, ब्रज के कुंड और अक्रूर के जंगल आज जवाब नहीं, कार्रवाई मांग रहे हैं—ताकि संरक्षण के दावे कागज़ों से निकलकर जमीन पर दिखाई दें और व्यवस्था पर उठ रहे सवालों का समाधान हो सके।
