एन0के0शर्मा
मध्य पूर्व की तपती रेत पर जब युद्ध के बूटों की आहट गूंजती है, तब केवल सीमाएँ नहीं कांपतीं—सभ्यताओं की स्मृतियाँ, संस्कृतियों की धरोहरें और मानवता की आत्मा भी थर्रा उठती है। आज जब संयुक्त राज्य, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव की आशंका या संभावित युद्ध की चर्चा वैश्विक मंचों पर तीव्र हो रही है, तब यह केवल रणनीतिक शक्ति-प्रदर्शन या भू-राजनीतिक वर्चस्व का प्रश्न नहीं रह जाता। यह उस भयावह त्रासदी का पूर्वाभास है जिसमें मानव जीवन, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक संवेदनाएँ एक साथ कुचल दी जाती हैं।
युद्ध का वास्तविक चेहरा किसी राजनैतिक भाषण या सैन्य प्रेस-कांफ्रेंस में दिखाई नहीं देता। उसका चेहरा उन शहरों के धुएँ में छिपा होता है जहाँ कभी जीवन की चहल-पहल थी। मध्य पूर्व के प्राचीन नगर—जिनकी दीवारों में हजारों वर्षों की सभ्यता की परतें दबी हैं—जब मिसाइलों की आग में झुलसते हैं तो केवल ईंट-पत्थर नहीं टूटते, बल्कि इतिहास के जीवित साक्ष्य मिट जाते हैं। जिस प्रकार ईराक युद्ध और सीरियन सिविल युद्ध के दौरान संग्रहालय, मस्जिदें, प्राचीन पुस्तकालय और पुरातात्विक स्थल खंडहरों में बदल गए थे, उसी प्रकार किसी भी व्यापक संघर्ष में ईरान और इस क्षेत्र की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरें भी विनाश के कगार पर खड़ी दिखाई देती हैं।
ईरान केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं है; वह हजारों वर्षों की फारसी सभ्यता का वाहक है। उसके भीतर Persepolis(फारस की राजधानी )जैसे प्राचीन स्थल हैं, जहाँ पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियाँ मानव इतिहास के गौरवशाली अध्यायों की गवाही देती हैं। यदि युद्ध की आग इन धरोहरों तक पहुँचती है तो यह केवल किसी एक देश की हानि नहीं होगी—यह सम्पूर्ण मानव सभ्यता की स्मृति पर प्रहार होगा। सांस्कृतिक विध्वंस की यह त्रासदी हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि युद्ध का लक्ष्य भले ही सैन्य प्रतिष्ठान हों, परन्तु उसके दुष्परिणाम सभ्यता की जड़ों को काट देते हैं।
परन्तु सांस्कृतिक विनाश से भी अधिक भयावह है मानव जीवन का तांडव। जब आकाश में लड़ाकू विमानों की गर्जना होती है और शहरों पर बम बरसते हैं, तब सड़कें केवल मलबे से नहीं भरतीं—वे कराहते हुए मनुष्यों, घायल बच्चों और अपने प्रियजनों को खो चुके परिवारों की चीत्कार से भर जाती हैं। युद्ध के मैदानों में मृत्यु का दृश्य इतना वीभत्स होता है कि वह किसी भी संवेदनशील मनुष्य के भीतर रक्त को जमा देने वाली ठंडक भर देता है। अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें, बिजली-पानी से वंचित शहर, धुएँ और धूल में ढकी बस्तियाँ—ये सब मिलकर उस त्रासदी का चित्र बनाते हैं जिसे अक्सर राजनीतिक बयानबाज़ी “अनिवार्य सैन्य कार्रवाई” कहकर छिपा देती है।
इतिहास गवाह है कि आधुनिक युद्धों में सैनिकों से अधिक आम नागरिक मारे जाते हैं। संयुक्त राष्ट्रों की कई रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि हाल के दशकों में युद्धों में मारे जाने वालों में अधिकांश हिस्सा नागरिकों का रहा है—बच्चे, महिलाएँ और वे लोग जिनका किसी भी सैन्य निर्णय से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। जब मिसाइलें शहरों पर गिरती हैं तो वे यह नहीं पूछतीं कि लक्ष्य कौन है; वे केवल जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा को मिटा देती हैं।
इस संघर्ष का एक और भयावह आयाम है मनोवैज्ञानिक आतंक। युद्ध केवल शरीर को नहीं मारता, वह पीढ़ियों की स्मृति में भय और आघात छोड़ जाता है। जिन बच्चों की आँखों ने बचपन में ही विस्फोटों की चमक और लाशों की कतारें देख ली हों, उनके लिए जीवन का अर्थ हमेशा के लिए बदल जाता है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में पनपती यह सामूहिक मानसिक पीड़ा आने वाले दशकों तक समाज को प्रभावित करती है—घृणा, प्रतिशोध और असुरक्षा की भावनाएँ धीरे-धीरे नई पीढ़ियों की चेतना में जड़ें जमा लेती हैं।
यदि व्यापक स्तर पर संघर्ष भड़कता है तो उसका प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। Strait of Hormuz(हाॅर्मुज़ जलडमरूमध्य) जैसे सामरिक समुद्री मार्गों के कारण यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है। यहाँ किसी बड़े युद्ध का अर्थ होगा विश्व अर्थव्यवस्था का हिल जाना, तेल बाजारों में उथल-पुथल और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक तनाव का और अधिक तीव्र होना। इस प्रकार एक क्षेत्रीय युद्ध देखते-देखते वैश्विक संकट में बदल सकता है।
इन सबके बीच सबसे गहरा प्रश्न यही है कि क्या मानव सभ्यता ने अपने इतिहास से कुछ सीखा है। बीसवीं शताब्दी के दो विश्वयुद्धों ने लाखों लोगों की जान ली, शहरों को मिट्टी में मिला दिया और मानवता को उस भयावह बिंदु तक पहुँचा दिया जहाँ उसने स्वयं को नष्ट करने की क्षमता प्राप्त कर ली। फिर भी आज भी दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध को समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
युद्ध की वास्तविकता दरअसल “विजय” या “पराजय” की सरल कहानी नहीं होती। वह असंख्य टूटे हुए घरों, अनाथ बच्चों, बर्बाद शहरों और खोई हुई सभ्यताओं की लंबी दास्तान होती है। जब किसी संघर्ष की समाप्ति होती है, तब भी उसके घाव वर्षों तक भर नहीं पाते। खंडहरों के बीच जीवन धीरे-धीरे लौटता है, परंतु इतिहास के पन्नों पर दर्ज वह त्रासदी हमेशा याद दिलाती रहती है कि मानवता ने अपनी ही रचना को किस क्रूरता से नष्ट किया था।
मध्य पूर्व के वर्तमान तनाव को देखते हुए यही आशंका बार-बार सिर उठाती है कि कहीं यह क्षेत्र फिर से उसी अंधकार में न डूब जाए जहाँ मानवता का स्वर युद्ध की गर्जना में दब जाता है। यदि कूटनीति और विवेक का मार्ग छोड़ा गया तो यह संघर्ष केवल सीमाओं का नहीं रहेगा—यह सभ्यता की आत्मा पर लगा वह घाव होगा जिसे आने वाली पीढ़ियाँ भी भूल नहीं पाएँगी।
ऐसे समय में विश्व समुदाय के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वह इतिहास के उन भयावह अध्यायों को दोहराने देगा, या फिर मानवता की रक्षा के लिए शांति और संवाद के रास्ते को प्राथमिकता देगा। क्योंकि अंततः युद्ध की राख में जीत किसी की नहीं होती—वहाँ केवल टूटे हुए सपनों, ध्वस्त स्मृतियों और मानवता की कराहती आवाज़ ही बचती है।
“मध्य पूर्व का महाविनाश: जब युद्ध की आग में जलती है सभ्यता और रोती है मानवता
Leave a Comment
