लोकतंत्र की कोख में पलता अराजक तंत्र : जब राजनीति ही भ्रष्टाचार और अपराध की जननी बन जाए

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एन0के0शर्मा
लोकतंत्र के इतिहास में यह विडंबना सबसे भयावह है कि जिस राजनीति को समाज की चेतना, नैतिकता और दिशा का वाहक होना था, वही आज भ्रष्टाचार, अपराध, अराजकता और देशविरोधी शक्तियों की सबसे सुरक्षित शरणस्थली बन चुकी है। राजनीति अब जनसेवा का माध्यम नहीं रही, बल्कि सत्ता के नशे में डूबी एक ऐसी मशीन बन गई है, जो अपराध को वैधता देती है, झूठ को विचारधारा बनाती है और संविधान को सुविधानुसार मोड़ती-तोड़ती है। यह केवल भारतीय संकट नहीं है, यह एक ऐसा मॉडल है जिसे वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र की असफलता के उदाहरण के रूप में पढ़ा जाएगा।
आज राजनीति अपराध से लड़ नहीं रही, अपराध को प्रबंधित कर रही है। अपराधी चुनाव जीतते हैं, सत्ता के गलियारों में प्रवेश करते हैं और फिर कानून उन्हीं के सामने नतमस्तक दिखाई देता है। यह कोई छिपा हुआ सत्य नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक षड्यंत्र है जिसमें सत्ता, धनबल, बाहुबल और भय का खुला गठजोड़ है। लोकतंत्र के नाम पर जनता को केवल वोट डालने का अधिकार दिया गया है, निर्णय लेने का नहीं।
पश्चिम बंगाल इस राजनीतिक पतन का सबसे नग्न और निर्मम प्रयोगशाला बन चुका है। वहाँ संविधान काग़ज़ों में जीवित है, व्यवहार में नहीं। सत्ता का संरक्षण प्राप्त हिंसा, राजनीतिक हत्याएँ, चुनावी आतंक, प्रशासन की पक्षधरता और विरोध की आवाज़ का दमन—ये सब किसी असफल राज्य के लक्षण होते हैं, न कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के। सत्ता के शीर्ष पर बैठा नेतृत्व जब संवैधानिक मर्यादाओं को चुनौती देता है, जब केंद्रीय संस्थाओं को खुलेआम अपमानित किया जाता है और जब हिंसा को “राजनीतिक प्रतिक्रिया” कहकर वैध ठहराया जाता है, तब यह शासन नहीं, सत्ता का अधिनायकवादी प्रदर्शन होता है।
धार्मिक उन्माद को सत्ता का औज़ार बनाना इस पतन का सबसे घातक पहलू है। धर्म यहाँ आस्था नहीं, रणनीति है। कहीं संगठित धर्म परिवर्तन, कहीं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, कहीं डर और लालच का खुला व्यापार। यह सब स्वतःस्फूर्त नहीं है—यह सुनियोजित है, संरक्षित है और राजनीतिक लाभ के लिए पोषित है। समाज को बाँटना अब विचारधारा नहीं, चुनावी गणित बन चुका है। जब सत्ता को बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के टकराव से ऊर्जा मिलती है, तब राष्ट्रीय एकता केवल भाषणों में बचती है।
भू-अधिग्रहण के नाम पर चल रही लूट वैश्विक पूँजी और स्थानीय सत्ता के गठजोड़ का उदाहरण है। किसान, आदिवासी, गरीब—सब विकास के नाम पर विस्थापित किए जा रहे हैं, और मुनाफ़ा राजनीति-माफ़िया-कॉरपोरेट त्रिकोण में बाँटा जा रहा है। यह विकास नहीं, आंतरिक उपनिवेशवाद है। जिनके हाथ में बंदूक या पार्टी का झंडा है, वही ज़मीन का मालिक बन जाता है। कानून यहाँ न्याय का नहीं, सौदेबाज़ी का दस्तावेज़ है।
सबसे खतरनाक तथ्य यह है कि अपराधियों और देशविरोधी ताकतों को संरक्षण अब अपवाद नहीं, राजनीतिक संस्कृति बन चुका है। राष्ट्रविरोधी नारे, अलगाववादी मानसिकता, कट्टरपंथी नेटवर्क—सब सत्ता की उपयोगिता के अनुसार सहनीय या असहनीय घोषित किए जाते हैं। जब राष्ट्रहित सत्ता-हित से नीचे चला जाए, तब लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार और लोकतंत्र की बात करने वाला तंत्र, भीतर से सड़ चुका होता है।
बाहुबल और भय ने नागरिक स्वतंत्रता को बंधक बना लिया है। पत्रकार, बुद्धिजीवी, आम नागरिक—सबके लिए एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है। सवाल पूछना अपराध है, असहमति देशद्रोह और चुप्पी समझदारी। यह वह अवस्था है जहाँ लोकतंत्र जीवित तो रहता है, लेकिन उसकी धड़कन कृत्रिम होती है।
यह संकट किसी एक दल, एक नेता या एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह एक मानसिक महामारी है—सत्ता को साध्य मानने वाली मानसिकता, जिसमें साधन कितना भी अमानवीय क्यों न हो। जनता की उदासीनता, संस्थाओं की कमजोरी और सत्ता की निरंकुशता—तीनों मिलकर इस विकृति को स्थायी बना रहे हैं।
यदि यह प्रवृत्ति नहीं रुकी, तो इतिहास भारत को उस देश के रूप में याद रखेगा जिसने लोकतंत्र तो चुना, लेकिन उसे बचाने का साहस नहीं दिखाया। यह लेख चेतावनी है—आरोप नहीं। क्योंकि जब राजनीति भ्रष्टाचार और अपराध की जननी बन जाती है, तब केवल शासन नहीं मरता, राष्ट्र की आत्मा भी घायल हो जाती है।

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