रोजगार-योग्यता पर बहस से आगे बढ़कर अब समाधान पर फोकस: उद्योग, शिक्षा और नीति के विशेषज्ञों ने ज़मीनी सच्चाई साझा की

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उद्योग, शिक्षा और नीति से जुड़े वरिष्ठ विशेषज्ञों ने ज़मीनी स्तर पर क्या काम कर रहा है, यह साझा किया।

नई दिल्ली, 02 April 2026: भारत एक ऐसे दौर में खड़ा है जहाँ एक तरफ बड़ी युवा आबादी का लाभ है और दूसरी तरफ तेज़ आर्थिक विकास। लेकिन इसके साथ एक अहम चुनौती भी सामने है, नौकरियों के अवसर और लोगों की रोजगार-योग्यता के बीच का अंतर।
आंकड़े बताते हैं कि केवल हर 5 में से 1 संस्थान (16.67%) ही ऐसे हैं जहाँ 76%–100% छात्रों को ग्रेजुएशन के छह महीने के भीतर नौकरी मिलती है। हालाँकि अलग-अलग क्षेत्रों में अवसर बढ़ रहे हैं, अब ध्यान सिर्फ नौकरी पाने पर नहीं, बल्कि काम के लिए तैयार होने पर है जिसमें स्किल्स, उनका सही इस्तेमाल और उद्योग की ज़रूरतों के साथ तालमेल ज़रूरी है।
इसी पृष्ठभूमि में उद्योग, शिक्षा और नीति से जुड़े वरिष्ठ विशेषज्ञों की एक बंद बैठक आयोजित की गई। इस सत्र की मेज़बानी ReNew की को-फाउंडर वैशाली निगम सिन्हा ने की। इसमें ऐसे लोग शामिल हुए जो भारत में रोजगार-योग्यता के एजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने ऐसे समाधान, अनुभव और मॉडल साझा किए जो ज़मीन पर असर दिखा रहे हैं और जिन्हें बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।
यह चर्चा ऐसे समय में हुई जब भर्ती के तरीके भी बदल रहे हैं। टीमलीज एडटेक की करियर आउटलुक रिपोर्ट HY1 2026 के अनुसार, 2026 के पहले छह महीनों में 73% कंपनियाँ फ्रेशर्स को नौकरी देने की योजना बना रही हैं, जो एंट्री-लेवल भर्ती में सुधार को दिखाता है। साथ ही, अब कंपनियाँ सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि वास्तविक काम की क्षमता को ज़्यादा महत्व दे रही हैं, जैसे इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट्स और प्रैक्टिकल अनुभव।
बैठक में मौजूद विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि रोजगार-योग्यता की समस्या को बड़े स्तर पर हल करने के लिए छोटे-छोटे अलग-अलग प्रयासों से आगे बढ़ना होगा। जब इंडस्ट्री को स्किल्ड लोग चाहिए, तब शिक्षा संस्थानों को ऐसे मॉडल अपनाने होंगे जो पढ़ाई, स्किलिंग और इंडस्ट्री की मांग को जोड़ें और परिणाम पर ध्यान दें।
शांतनु रूज, संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, टीमलीज एडटेक ने कहा, “भारत की रोजगार-योग्यता की चुनौती अब सिर्फ अवसरों की नहीं, बल्कि शिक्षा और काम के बीच तालमेल की है। डेटा दिखाता है कि कंपनियाँ भर्ती के लिए तैयार हैं, लेकिन अब वे चयन के तरीके भी बदल रही हैं। इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट्स और प्रैक्टिकल लर्निंग जैसे प्रमाण अब ज्यादा मायने रखते हैं। आगे का दौर इस बात पर निर्भर करेगा कि संस्थान, कंपनियाँ और नीति निर्माता मिलकर ऐसे रास्ते बनाएं जो पढ़ाई को असली काम से जोड़ें।”
वैशाली निगम सिन्हा, को-फाउंडर, ReNew ने कहा, “भारत के पास टैलेंट भी है और अवसर भी। अब ज़रूरत है सही तालमेल की। हमें इरादे से आगे बढ़कर काम करना होगा और रोजगार-योग्यता को सिस्टम का हिस्सा बनाना होगा। ऐसे मॉडल जो इंडस्ट्री एक्सपोज़र, प्रैक्टिकल लर्निंग और असली समस्याओं पर काम करने का मौका देते हैं, वे अच्छे

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