लखनऊ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कहा कि विकसित भारत-2047 के संकल्प में 140 करोड़ देशवासियों के मुकदमा मानकर युवा अधिवक्ताओं को पैरवी करनी होगी.
उन्होंने कहा कि विकसित भारत का दावा केवल संकल्प व्यक्त करने से पूरा नहीं होगा. इसके लिए तथ्य, साक्ष्य, तर्क और एक ईमानदार अधिवक्ता की ज़रूरत होगी. इस मुकदमे में प्रतिवादी कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि वह यथास्थितिवादी सोच है, जो मानती है कि बदलाव संभव नहीं है.
शुक्रवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पांचवे दीक्षांत समारोह के सम्बोधन के दौरान विवि के शासी परिषद के अध्यक्ष होने के चलते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभिभावक के रूप में नज़र आए.
मुख्यमंत्री के सम्बोधन से पूर्व सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रमनाथ व इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली ने छात्रों को सम्बोधित किया. इस दौरान टॉपर छात्र-छात्राओं को मेडल व उपाधि देने के बाद विधि के छात्रों को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी सोच किसी तर्क को सुनने, साक्ष्य को समझने और नई संभावनाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती.
युवा अधिवक्ताओं को इसी मानसिकता के सामने अपने तर्क मज़बूती से रखने होंगे. उन्होंने कहा कि सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय में प्रमाद न करना और आलस्य से दूर रहना किसी भी अधिवक्ता के लिए सबसे संक्षिप्त और प्रभावी कार्य विवरण हो सकता है.
15 अगस्त 1947 को पड़ी थी विकसित भारत के मुकदमे की पहली तारीख
इस दौरान न्यायालयों की कार्यप्रणाली का उदाहरण देते हुए मुख्यमंत्री कहा कि किसी मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश के सामने तारीखों और घटनाक्रम का विवरण आता है. इसी तरह विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि विकसित भारत के इस मुकदमे की पहली तारीख कब पड़ी थी.
उन्होंने कहा कि इसकी पहली तारीख 15 अगस्त 1947 थी, जब भारत स्वतंत्र हुआ. आजादी की लड़ाई और संविधान निर्माण में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के साथ विधि के जानकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
उन्होंने कहा कि जिस विकसित भारत के मुकदमे की चर्चा वह कर रहे हैं, उसकी अगली महत्वपूर्ण तारीख 15 अगस्त 2047 होगी. उस समय देश की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होंगे. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए युवा अधिवक्ताओं और विद्यार्थियों को अपनी भूमिका समझनी होगी तथा तथ्यों, साक्ष्यों और तर्कों के आधार पर विकसित भारत के संकल्प की पैरवी करनी होगी.
रूल आफ लॉ और रूलर आफ लॉ में बताया बुनियादी अंतर
मुख्यमंत्री ने कहा कि 26 जनवरी 1950 वह ऐतिहासिक तारीख है, जब भारत ने अपना संविधान लागू किया. मेरा मानना है कि देश का प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक शासक और प्रत्येक संस्था संविधान से बंधी हुई है. एक भारत, श्रेष्ठ भारत और विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने वाला सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भारतीय संविधान है.
उन्होंने कहा कि विकसित भारत के इस मुकदमे की दूसरी महत्वपूर्ण तारीख 26 जनवरी 1950 है, जब संविधान लागू हुआ. इसके बाद तीसरी तारीख 25 जून 1975 आई, जब देश में आपातकाल लागू किया गया.
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा चुनाव को अमान्य घोषित किया था. इसके ठीक 13 दिन बाद देश में आपातकाल लागू कर दिया गया.
उन्होंने आपातकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना की ऐतिहासिक असहमति का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने की उन्हें कीमत चुकानी पड़ी थी, लेकिन इतिहास उनकी असहमति को कभी नहीं भूला.
उन्होंने कहा कि वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने वाले फैसले में न्यायमूर्ति खन्ना के उस ऐतिहासिक दृष्टिकोण का उल्लेख किया. आपातकाल का दौर देश को यह समझाने वाला सबक था कि रूल ऑफ लॉ यानी कानून का शासन और रूलर आफ लॉ यानी शासक की मनमर्जी के अनुसार कानून चलना, दोनों में बुनियादी अंतर है.
राम, कृष्ण और शिव भारत के तीन महान स्वप्न
मुख्यमंत्री ने कहा कि विकसित भारत के इस मुकदमे की चौथी महत्वपूर्ण तारीख वर्ष 2006 है. इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के लेख राम, कृष्ण और शिव का उल्लेख करते हुए कहा कि लोहिया ने भारत की पूर्णता के तीन महान स्वप्नों के रूप में राम, कृष्ण और शिव को रेखांकित किया था.
लोहिया ने शिव को ऐसे मस्तिष्क का प्रतीक माना, जो विषम से विषम परिस्थितियों में भी विचलित हुए बिना निर्णय लेने की क्षमता रखता है. कृष्ण ऐसे हृदय के प्रतीक हैं, जिसमें गरीब और वंचित के प्रति संवेदना हो.
वहीं राम मर्यादा, वचनबद्धता और कर्म की दृढ़ता के प्रतीक हैं. उन्होंने विधि के विद्यार्थियों से कहा कि एक आदर्श विधिवेत्ता में भी इन तीनों गुणों का होना आवश्यक है.
इस दौरान मुख्यमंत्री ने कानूनी और प्रशासनिक सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि अप्रासंगिक हो चुके 1500 से अधिक कानूनों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाप्त किया और कानूनी प्रक्रियाओं को नागरिकों के लिए अधिक सरल बनाने के प्रयास किया.
टॉप फाइव अर्थव्यवस्था तक पहुंचा भारत
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वर्ष 2013 में भारत की गिनती दुनिया की फ्रैजाइल फाइव यानी पांच कमजोर अर्थव्यवस्थाओं में होती थी. उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता और निवेश की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन पिछले वर्षों में भारत ने अपनी स्थिति में बड़ा बदलाव किया है. आज भारत दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है.
प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को विश्वास दिलाया कि जब भारत ‘फ्रैजाइल फाइव’ से निकल कर दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है, तो विकसित भारत का लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है.
उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि एक दशक पहले प्रदेश में निवेश की संभावनाओं पर सवाल उठाए जाते थे. कानून-व्यवस्था, कनेक्टिविटी और स्पष्ट नीतियों की कमी का हवाला देकर कहा जाता था कि यहां निवेश करना जोखिम भरा है. वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्यों की श्रेणी में रखा जाता था. लोगों के मन में यह धारणा बन गई थी कि देश में बदलाव संभव है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सुधार नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश ने यथास्थितिवादी सोच और जड़ता का शिकार होने के बजाय परिवर्तन का रास्ता चुना.
पहले प्रदेश में माफिया का शासन चलता था, लेकिन सरकार ने इस व्यवस्था को समाप्त कर कानून के शासन को स्थापित करने की दिशा में काम किया. उन्होंने कहा कि प्रदेश में वास्तविक बदलाव लाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति ज़रूरी है. इसी बदलाव के कारण उत्तर प्रदेश बीमारू राज्यों की श्रेणी से निकल कर देश की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ा है.
उन्होंने विधि के विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें भी कानून के शासन के सजग प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका निभानी होगी.
2047 में आज के विधि विद्यार्थी होंगे देश के नेतृत्वकर्ता
मुख्यमंत्री ने दीक्षांत समारोह को विकसित भारत के संकल्प से जोड़ते हुए कहा कि वर्ष 2047 में, जब भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होंगे, तब आज उपाधि प्राप्त कर रहे अनेक विद्यार्थी देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे होंगे. कोई न्यायाधीश के रूप में न्याय की पीठ पर बैठेगा, कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनकर लोगों को न्याय दिलाएगा, तो कोई विधायिका, कार्यपालिका या अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में नेतृत्व करेगा.
कुछ विद्यार्थी भविष्य में विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों को संबोधित करने की स्थिति में भी होंगे. उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण केवल सड़कों, कारखानों और एक्सप्रेसवे से नहीं होगा. इसकी मज़बूत नींव न्याय, अधिकारों और कर्तव्यों की व्यवस्था पर रखनी होगी. इसके लिए आज के विद्यार्थियों को अभी से तैयारी करनी होगी.
गौतम के न्यायसूत्र में बताए गए चार प्रमाण
मुख्यमंत्री ने भारतीय न्याय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय दर्शन में महर्षि गौतम के न्यायसूत्र का विशेष महत्व है. इसमें ज्ञान प्राप्त करने के चार प्रमुख प्रमाण बताए गए हैं. उनमें प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द शामिल है.
उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष अनुभव, अनुमान, तुलना और विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त ज्ञान की ये अवधारणाएं आज भी तर्क, साक्ष्य और न्याय की समझ विकसित करने में उपयोगी हैं. विधि के विद्यार्थियों को इन परंपराओं का अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि भारतीय ज्ञान परंपरा में न्याय और प्रमाण की अवधारणाएं हजारों वर्षों से महत्वपूर्ण रही हैं.
मुख्यमंत्री ने भारतीय उपनिषदों और धर्म-दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में सत्ता को भी धर्म और न्याय के अधीन माना गया है. राजा भी धर्म से ऊपर नहीं है. यही कानून के शासन का मूल सिद्धांत है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आज के युग में धर्म की स्थापना न्याय के माध्यम से होगी और न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विधि के विद्यार्थियों तथा अधिवक्ताओं के कंधों पर होगी.
उन्होंने कहा कि कानून की सबसे बड़ी पूंजी उसकी धाराएं नहीं, बल्कि आम जनता का विश्वास और भरोसा है. उन्होंने वर्ष 2030 तक उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके लिए विजन डॉक्यूमेंट जारी किया गया है और योजनाबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है.
अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन भी ज़रूरी
मुख्यमंत्री ने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिकारों की अवधारणा को कर्तव्य और कर्म से अलग करके नहीं देखा जा सकता. उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, वहीं अनुच्छेद 51ए के अंतर्गत मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख करता है. अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है. नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए.
डीपफेक के दौर में प्रत्यक्ष साक्ष्य की प्रमाणिकता बड़ी चुनौती
मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीक ने कार्यों को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी पैदा हुई हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से अब शोध, आंकड़ों के विश्लेषण और संभावित परिणामों का आकलन पहले की तुलना में बहुत कम समय में किया जा सकता है. हालांकि, तकनीक के दुरुपयोग से अपराधों के नए तरीके भी सामने आ रहे हैं.
उन्होंने डीपफेक का उदाहरण देते हुए कहा कि आज किसी व्यक्ति का चेहरा और आवाज हूबहू तैयार की जा सकती है. ऐसे में केवल आंखों से देखकर या आवाज सुनकर किसी सामग्री को वास्तविक मान लेना खतरनाक हो सकता है. विधि के विद्यार्थियों को समझना होगा कि डिजिटल युग में प्रत्यक्ष साक्ष्य की प्रमाणिकता की जांच किस प्रकार की जाए.
एआई को सहायक बनाइए, सारथी नहीं
इस दौरान मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों के सामने उठने वाले एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उल्लेख किया कि क्या भविष्य में एआई वकीलों की जगह ले लेगा. इसके जवाब में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान देने के बाद अंतिम निर्णय लेने की स्वतंत्रता उसी के विवेक पर छोड़ते हैं. इसी प्रकार, एआई से जानकारी और विश्लेषण प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय में मानवीय विवेक की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहनी चाहिए.
मुख्यमंत्री ने इसे आधुनिक तकनीकी भाषा में ह्यूमन इन द लूप की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि तकनीक निर्णय लेने में सहायता कर सकती है, लेकिन न्याय, नैतिकता और जिम्मेदारी के प्रश्नों पर मानवीय विवेक को बनाए रखना आवश्यक है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग कार्यों को आसान बनाने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन उस पर इतनी निर्भरता नहीं होनी चाहिए कि वह सुझाव देने के साथ फैसले भी लेने लगे. एआई को सहायक बनाइए, सारथी नहीं. कोड मशीन लिख सकती है, लेकिन कोड ऑफ कंडक्ट का पालन व्यक्ति को स्वयं करना होगा.
दिए सफलता के चार मंत्र
मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को जीवन और पेशे में आगे बढ़ने के लिए चार प्रमुख मंत्र दिए. जिनमे पहला मंत्र मुख्य भूमिका में रहें, अन्याय के सामने चुप न रहें. विधि के विद्यार्थियों को भी जीवन में साइड कैरेक्टर बनने के बजाय मुख्य भूमिका निभानी चाहिए. अन्याय सामने होने पर चुप रहना किसी विधि विशेषज्ञ के लिए विकल्प नहीं हो सकता. दूसरा मंत्र अपनी जड़ों से जुड़े रहें.
उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों को मज़बूत रखने वाला व्यक्ति ही लंबी यात्रा तय कर सकता है. तीसरा मंत्र अपनी साख और नैतिकता बनाए रखें.
मुख्यमंत्री ने कहा कि करियर में कई बार ऐसे अवसर आएंगे, जब कोई व्यक्ति यह कहेगा कि थोड़ा-सा समझौता कर लीजिए, सभी ऐसा करते हैं, लेकिन यही वह क्षण है, जहां से शॉर्टकट की शुरुआत होती है और वर्षों में बनाई गई साख समाप्त हो सकती है. चौथा मंत्र हमेशा अपडेट रहें. मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को कानून, तकनीक और बदलते सामाजिक परिवेश के साथ लगातार स्वयं को अपडेट रखने की सलाह दी.
140 करोड़ भारतीयों के विश्वास की पैरवी करें
मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को उनकी डिग्री की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इसे केवल शैक्षणिक उपाधि के रूप में न देखें। इसके साथ 140 करोड़ भारतीयों के विश्वास की जिम्मेदारी भी जुड़ी है. उन्हें इस विश्वास पर खरा उतरने और न्याय के पक्ष में मज़बूती से खड़े होने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा. उन्होंने कहा कि जब भी कोई मुक़दमा कठिन लगे या कोई निर्णय भारी प्रतीत हो, तो भारत के संविधान का स्मरण करें. संविधान ही उनका मार्ग प्रशस्त करेगा और उन्हें अपने कर्तव्य का बोध कराएगा.
