Piles Treatment

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मीना अग्रवाल
नेचुरोपैथी

Piles Treatment – एक ऐसी बीमारी जिसके बारे में लोग खुलकर बात नहीं करते – इस पोस्ट में हम एक ऐसी समस्या के बारे में बात कर रहे हैं जिसके बारे में बहुत से लोग खुलकर बात करने से हिचकिचाते हैं।

कई लोगों को यह बीमारी होती है लेकिन शर्म या झिझक की वजह से वे किसी से बताते नहीं हैं। यहां तक कि डॉक्टर के पास जाने से भी बचते रहते हैं। नतीजा यह होता है कि शुरुआत में जो समस्या आसानी से संभाली जा सकती थी, वह धीरे-धीरे बढ़ती जाती है।

यह समस्या है बवासीर, जिसे पाइल्स या हेमोरॉइड्स भी कहा जाता है। बहुत से लोग इसे सहते रहते हैं लेकिन सही जानकारी और सही इलाज मिलने पर इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद में भी इस बीमारी का विस्तार से वर्णन मिलता है और इसके लिए कई उपाय बताए गए हैं।

हम समझेंगे कि बवासीर क्या है, इसके पीछे कारण क्या हो सकते हैं और ऐसे कौन-कौन से उपाय हैं जिन्हें आप अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं। इनमें घरेलू उपाय, खान-पान से जुड़ी बातें और कुछ सुझाव भी शामिल हैं।

बवासीर को क्या कहा गया है
ग्रंथों में बवासीर को अर्श कहा गया है। इसका अर्थ समझाने के लिए एक श्लोक भी बताया गया है,

जिसका भाव यह है कि जो रोग व्यक्ति को शत्रु की तरह लगातार पीड़ा देता है, उसे अर्श कहा जाता है।

इस स्थिति में गुदा मार्ग के आसपास छोटे-छोटे उभार या मस्से बन जाते हैं। ये उभार मल के रास्ते में रुकावट पैदा कर सकते हैं, जिससे मल त्याग करते समय दर्द, जलन या खून आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसके कई प्रकार बताए गए हैं। सामान्य रूप से इसे दो मुख्य रूपों में समझा जा सकता है। एक वह जिसमें मस्से सूखे होते हैं और दूसरा वह जिसमें खून या स्राव निकलता है। इसके अलावा शरीर के दोषों के आधार पर भी इसके अलग प्रकार बताए गए हैं, जैसे वातज, पित्तज, कफज और रक्तज अर्श।

बवासीर होने के पीछे कारण
हर प्रकार की बवासीर के कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा मसालेदार, तला हुआ या अत्यधिक गरम तासीर वाला भोजन करता है तो इससे शरीर में पित्त दोष बढ़ सकता है। यही पित्त दोष आगे चलकर रक्त को भी प्रभावित करता है और कुछ मामलों में खून आने वाली बवासीर की स्थिति पैदा हो सकती है।

इसके अलावा लगातार गुस्सा करना, देर रात तक जागना, अनियमित दिनचर्या और खराब खान-पान भी शरीर के संतुलन को बिगाड़ देते हैं। लंबे समय में यही आदतें कई तरह की समस्याओं को जन्म देती हैं, जिनमें बवासीर भी शामिल हो सकती है।

सबसे बड़ा कारण: कब्ज
बवासीर के पीछे सबसे बड़ा कारण माना जाता है कब्ज। जब पेट ठीक से साफ नहीं होता और मल सख्त हो जाता है, तो मल त्याग करते समय ज्यादा जोर लगाना पड़ता है। इससे गुदा क्षेत्र की नसों पर दबाव बढ़ता है और धीरे-धीरे मस्से बन सकते हैं।

बहुत से लोग कब्ज से राहत पाने के लिए तेज असर वाली दवाइयां या लैक्सेटिव्स लेने लगते हैं। लेकिन लंबे समय तक इन दवाइयों पर निर्भर रहना सही नहीं माना जाता क्योंकि इससे शरीर को उनकी आदत पड़ सकती है।

इसके बजाय कुछ हल्के और प्राकृतिक उपाय अपनाए जा सकते हैं जो धीरे-धीरे पाचन को बेहतर बनाते हैं।

कब्ज कम करने के कुछ सरल उपाय
एक आसान तरीका यह है कि घर का बना हुआ थोड़ा सा सफेद मक्खन लिया जाए और उसमें थोड़ा मिश्री पाउडर मिलाकर खाया जाए। मक्खन की चिकनाई मल को नरम बनाने में मदद करती है, जिससे मल त्याग में आसानी हो सकती है। इससे जलन और सूजन में भी कुछ राहत मिल सकती है।

गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह तरीका अपेक्षाकृत हल्का माना जाता है। वे चाहें तो दूध में थोड़ा घी मिलाकर भी ले सकती हैं जिससे मल त्याग आसान हो सकता है।

मुनक्का और अंजीर का उपयोग
काला मुनक्का और अंजीर भी पारंपरिक रूप से पाचन सुधारने के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। रात में 8–10 मुनक्के और एक-दो अंजीर पानी में भिगोकर रख दें और सुबह उन्हें खा लें।

ये फाइबर और प्राकृतिक गुणों की वजह से मल को नरम बनाने में मदद कर सकते हैं। जिन लोगों को बवासीर के साथ खून आने की समस्या होती है और इससे शरीर में कमजोरी या खून की कमी महसूस होती है, उनके लिए भी यह मददगार माने जाते हैं।

मुलेठी और हरड़
मुलेठी का चूर्ण भी पाचन के लिए हल्का सहायक माना जाता है। आधा से एक चम्मच मुलेठी पाउडर दिन में एक या दो बार लिया जा सकता है।

इसी तरह हरड़ का चूर्ण भी आयुर्वेद में पाचन सुधारने के लिए जाना जाता है। इसे गुड़ के साथ लिया जा सकता है या हल्के घी में भूनकर रात को लिया जा सकता है ताकि अगली सुबह पेट साफ हो सके।

ध्यान रखने वाली बात यह है कि सभी उपाय एक साथ करने की जरूरत नहीं होती। व्यक्ति अपनी सुविधा और जरूरत के अनुसार एक-दो उपाय चुन सकता है।

शरीर के प्राकृतिक संकेतों को न रोकें
एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बताया गया है कि शरीर के प्राकृतिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए। इनमें मल त्याग, पेशाब, भूख और प्यास जैसे संकेत शामिल हैं।

अगर कोई व्यक्ति बार-बार इन संकेतों को रोकता है या मल त्याग करते समय जरूरत से ज्यादा जोर लगाता है, तो इससे शरीर में कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए जब भी शरीर संकेत दे, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

गर्म पानी में बैठना
बवासीर के कुछ मामलों में गर्म पानी में बैठना भी राहत देने वाला तरीका माना जाता है। एक टब में सहन करने लायक गर्म पानी लें और उसमें 15–20 मिनट बैठें।

कुछ लोग इसमें हल्दी पाउडर या त्रिफला का काढ़ा भी मिला लेते हैं। इससे उस जगह की मांसपेशियों को आराम मिल सकता है और दर्द या सूजन कम होने में मदद मिल सकती है।

बाहरी इस्तेमाल के उपाय
बाजार में कई तरह की क्रीम और मलहम मिलते हैं जो अस्थायी राहत दे सकते हैं। लेकिन आयुर्वेद में कुछ पारंपरिक तेल और घृत भी बताए गए हैं जिन्हें उस स्थान पर लगाया जा सकता है।

जैसे जात्यादि तेल, शतधौत घृत या मुलेठी से बना घी। इन्हें मल त्याग से पहले और बाद में लगाया जा सकता है जिससे जलन और सूजन कम करने में मदद मिल सकती है।

खान-पान का बहुत बड़ा महत्व
बवासीर की रोकथाम और इलाज दोनों में खान-पान की बड़ी भूमिका होती है।

ताजा और हल्का भोजन करना बेहतर माना जाता है। जैसे अच्छी तरह पका हुआ चावल, मूंग दाल या मसूर दाल। इन चीजों के साथ थोड़ा घी लेने से पाचन को भी सहारा मिलता है।

इसके विपरीत कुछ चीजों से बचना बेहतर होता है, जैसे बहुत ज्यादा मसालेदार भोजन, तली हुई चीजें, ज्यादा चाय-कॉफी और बहुत भारी दालें जैसे उड़द, छोले या राजमा।

छाछ का सेवन
आयुर्वेद में छाछ को भी पाचन के लिए लाभकारी बताया गया है। इसमें थोड़ा जीरा और धनिया पाउडर मिलाकर लिया जा सकता है।

अगर जलन ज्यादा होती है तो इसमें थोड़ा मिश्री पाउडर मिलाया जा सकता है। वहीं अगर कफ की समस्या ज्यादा हो तो छाछ में जीरा और हींग का हल्का तड़का लगाया जा सकता है।

व्यायाम और जीवनशैली
बहुत ज्यादा कठोर शारीरिक गतिविधि जैसे अत्यधिक दौड़ना या भारी व्यायाम भी शरीर में असंतुलन पैदा कर सकता है। वहीं बिल्कुल भी व्यायाम न करना भी सही नहीं है।

इसलिए संतुलित और हल्का व्यायाम करना बेहतर माना जाता है। इसके अलावा बहुत सख्त सतह पर लंबे समय तक बैठने से भी बचना चाहिए।

तनाव का भी असर पड़ता है
तनाव और चिंता का सीधा असर पाचन तंत्र पर पड़ता है। जब मन अशांत रहता है तो पाचन भी प्रभावित होता है और मल त्याग की प्रक्रिया भी गड़बड़ा सकती है।

इसलिए मानसिक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। इसके लिए योग, प्राणायाम और ध्यान जैसे अभ्यास मदद कर सकते हैं।

जब दवाइयों से राहत न मिले
कई मामलों में दवाइयों और घरेलू उपायों से राहत मिल जाती है। लेकिन कुछ स्थितियां ऐसी भी होती हैं जहां मस्से बहुत बड़े हो जाते हैं या समस्या गंभीर हो जाती है।

ऐसे मामलों में आयुर्वेद में भी अलग-अलग प्रकार की चिकित्सा बताई गई है, जैसे क्षार चिकित्सा, अग्निकर्म या आवश्यकता होने पर शल्य चिकित्सा।

Conclusion
बवासीर एक ऐसी समस्या है जिसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं होता। सही समय पर ध्यान दिया जाए, खान-पान सुधारा जाए और जीवनशैली में बदलाव किया जाए तो कई मामलों में इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

सबसे जरूरी बात यह है कि शर्म या झिझक की वजह से इलाज से दूर न रहें। शरीर के संकेतों को समझें, पाचन को मजबूत रखें और जरूरत पड़ने पर योग्य चिकित्सक से सलाह जरूर लें।

Health is wealth

मीना अग्रवाल
आगरा

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