अयोध्या। जिस अयोध्या महोत्सव को आयोजक संस्कार, संस्कृति और मर्यादा का महाकुंभ बताकर प्रचारित करते रहे, उसी महोत्सव ने समापन के दिन अपनी असलियत खुद ही उजागर कर दी। मंच पर राम नगरी की पवित्रता का उपदेश, और मंच के नीचे अव्यवस्था, गंदगी और कथित आपत्तिजनक सामग्री यह विरोधाभास नहीं, बल्कि आयोजकों की सोच और नीयत का खुला प्रमाण बन गया है।
समापन के दिन पार्किंग स्थल में कथित तौर पर कंडोम के पैकेट, मांस और मदिरा से जुड़ी सामग्री मिलने के दावों ने पूरे आयोजन पर सवालिया निशान लगा दिया है। यह वही आयोजन है, जिसमें परिवारों, महिलाओं और बच्चों को संस्कारों से जुड़ने का न्योता दिया गया था। सवाल यह है कि क्या यही संस्कार थे, जिन्हें दिखाने के लिए लाखों खर्च किए गए?
आरोप है कि आयोजक पूरी तरह वीआईपी संस्कृति में डूबे रहे। पास सिस्टम, मंच की चमक, कैमरे और फोटो सेशन पर पूरा ध्यान रहा, लेकिन पार्किंग, निगरानी, सुरक्षा और सफाई जैसे बुनियादी दायित्वों को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि आयोजन स्थल का पिछला चेहरा ऐसा निकला, जिसने राम नगरी की गरिमा पर सीधा तमाचा मारा।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर गैर-जिम्मेदारी है। जिस नगरी को मर्यादा पुरुषोत्तम राम की धरती कहा जाता है, वहां इस तरह की कथित सामग्री का मिलना आयोजकों की जवाबदेही पर सीधा सवाल है। अब सवाल सिर्फ अव्यवस्था का नहीं, बल्कि नियंत्रण, निगरानी और मंशा का बन गया है।
अब अयोध्या में लोग तीखे तंज के साथ पूछ रहे हैं क्या अयोध्या महोत्सव आयोजकों के लिए संस्कार सिर्फ ब्रांडिंग टूल बनकर रह गए हैं?
क्या राम नगरी की मर्यादा को सिर्फ पोस्टर और मंच तक सीमित कर दिया गया था?
आयोजन की बदइंतज़ामी की जिम्मेदारी कौन लेगा, या इसे भी भव्य आयोजन के शोर में दबा दिया जाएगा?
स्थानीय लोगों ने साफ कर दिया है कि अगर आगे भी इसी तरह आयोजनों में अराजकता और दिखावे का खेल चलता रहा, तो उसका खुला विरोध किया जाएगा। अयोध्या महोत्सव अब एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि आयोजन की आड़ में अव्यवस्था, लापरवाही और नैतिक पतन का उदाहरण बन चुका है।
राम नगरी में यह मामला अब सिर्फ चर्चा का नहीं, बल्कि आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग का रूप ले चुका है। सवाल सीधा है मर्यादा की बात करने वालों ने आखिर खुद मर्यादा क्यों छोड़ दी?
राम नगरी में मर्यादा का मुखौटा, ज़मीन पर गंदगी का खेल! अयोध्या महोत्सव बना दिखावे और लापरवाही का प्रतीक
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