वी पी एस खुराना
मथुरा जनपद की तहसील गोवर्धन में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस में जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को स्वयं बैठकर फरियादियों की समस्याएं सुननी पड़ीं। सैकड़ों प्रार्थना–पत्रों की मौजूदगी ने एक बार फिर स्थानीय स्तर पर शिकायत निस्तारण की व्यवस्था पर सीधा प्रश्नचिह्न लगा दिया। कागज़ों में चौकी, थाना, सीओ और तहसील स्तर पर त्वरित सुनवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि न्याय की उम्मीद लेकर जनता को हर बार उच्च अधिकारियों के सामने ही गुहार लगानी पड़ रही है।
समाधान दिवस में पहुंचे अधिकांश फरियादियों का कहना था कि वे पहले संबंधित थाने, चौकी और राजस्व विभाग के चक्कर काट चुके हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हुई या केवल आश्वासन मिला। यही वजह रही कि छोटी-छोटी शिकायतें भी जिलास्तरीय जनसुनवाई तक पहुंचीं। यह स्थिति साफ संकेत दे रही है कि निचले स्तर पर या तो समस्याओं का समयबद्ध निस्तारण नहीं हो रहा या फिर की गई कार्रवाई से फरियादी संतुष्ट नहीं हैं।
पुलिस और राजस्व विभाग की ओर से लगातार अभियान, समीक्षा बैठकें और त्वरित कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन कप्तान कार्यालय से लेकर तहसील समाधान दिवस तक उमड़ रही भीड़ इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। समाधान दिवस में अधिकारियों को मौके पर ही संबंधित विभागों को निर्देश देने पड़े, जिससे स्पष्ट है कि कई प्रकरणों में फाइलें पहले स्तर पर ही लंबित पड़ी थीं।
सबसे गंभीर तथ्य यह है कि भूमि विवाद, पैमाइश, कब्जा, मारपीट, पारिवारिक और पुलिस से जुड़े मामलों की संख्या सबसे अधिक रही। ये वही मामले हैं जिनका निस्तारण स्थानीय स्तर पर होना चाहिए। इसके बावजूद फरियादियों का बार-बार उच्च स्तर पर पहुंचना व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है।
हालांकि जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा शिकायतों को गंभीरता से सुनते हुए समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश दिए गए, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब हर समस्या का समाधान सम्पूर्ण समाधान दिवस में ही होना है तो चौकी, थाना और तहसील स्तर पर चल रही जनसुनवाई की व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाता है।
सम्पूर्ण समाधान दिवस में बढ़ती भीड़ यह संदेश दे रही है कि जनता को अपने क्षेत्र में न्याय नहीं मिल रहा और उसे ‘आखिरी दरबार’ का इंतजार करना पड़ता है। अगर निचले स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हुई तो समाधान दिवस केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा और फरियादियों की भीड़ हर महीने व्यवस्था से यही सवाल पूछती रहेगी—न्याय के लिए जनता को आखिर कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ेंगी?
