गली-गली में शोर हुआ, जब वक्त आखिरी आया था,
भारत मां ने अपने, तीन शेरों को बुलाया था।
23 मार्च की शाम खड़ी, जेल के उन दरवाजों पर,
कांप रहे थे गोरे भी, उन वीरों के इरादों पर।
वो भगत, राजगुरु, सुखदेव, हाथों में हाथ सजाते थे,
फांसी की उस रस्सी को, देख-देख मुस्काते थे।
न आंखों में कोई आंसू था, न दिल में कोई शिकवा था,
उनके सर पर तो बस, आजादी का इक जज्बा था।
“मेरा रंग दे बसंती चोला”, गाकर जेल गुंजाई थी,
गोरों की उस सत्ता को, उनकी नानी याद दिलाई थी।
जल्लाद खड़ा था सहमा सा, रस्सी भी रोने वाली थी,
क्योंकि उन बेटों की कुर्बानी, सबसे ऊपर होने वाली थी।
चूमा फंदा हंसकर ऐसे, जैसे गले लगाया हो,
जैसे बरसों बाद किसी ने, अपना मीत पाया हो।
झुक गया सर फिरंगियों का, देख वो मंजर भारी था,
मरकर भी वो जीत गए, ये भारत मां की बारी थी।
“वो मौत नहीं थी साहिब, वो तो अमर कहानी थी,
वो आंखे, वो जज्बा, वो साहस, वो हिम्मत।
वो देश प्रेम भी निराला था,
जो लिख दी उन वीरों ने, वो अपनी ही जवानी थी।”
आज भी उनकी यादों में, आँखें भर-भर आती हैं,
उनकी पावन कुर्बानी, सोए शेर भी जगाती हैं।
नमन है उन मतवालों को, जो हंसकर फांसी झूल गए,
वतन की खातिर अपनी, हर एक हस्ती जो भूल गए।
इंकलाब जिंदाबाद!
मिताली ममता शर्मा
